कि आँखें नम, दिल हैरान और दिमाग में कई सवाल हुए

कि आखिर क्या था, उन शब्दों में, जो इतने कुकर्म सरेआम हुए

हाँ माना सवाल जरूरी थे, सच की तलाश जो बाकी थी

पर किसके हिस्से क्या आया

पर किसके हिस्से क्या आया, कुछ अन्तर्द्वन्द्व भी बाकी थे

खैर जो हुआ, सो हुआ, अब तो उन्हें चैन से सोने दो

सैनिक ना सही, हो गये भेंट, राजनीति की भेंट ना चढने दो

हिन्दुस्तानी हो या हो कोई पाकी, आवाम तो शान्तिप्रिय रही

घर का बुझे अगर कोई दीपक, किसको ये बात वाज़ीब रही

अब घर की बात है आ ही गई, तो मेरी बात भी सुन लो तुम

आज पर्व है गणतन्त्र का, सारे द्वेष को भूलो तुम

शायद लगे कुछ बातें कडवी, सच्चाई स्वीकार करो

दिल से हम सभी हैं भारतीय, इस पर अभिमान करो

पर्व है गणतन्त्र का, इस तन्त्र में हम बँध जाएँ

ऊँचा-नीचा, हिन्दू-मुस्लिम, भूलकर हम

तिरंगे की शान सर्वप्रथम केवल भारतीय कहलाए


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