निगाहें


निगाहें शक करती हैं,
हाँ, ये शक पैदा करती हैं।
चाहतें झूठी हों फिर भी,
हाँ, ये चाहते पैदा करती हैं।
किसी के हालातो को भाँपना ,
बस यही हिमाकत है इसकी।
किसी आँखो को पढ पाना
बस यही चाहत है इसकी।
कुछ छिपाता है, कुछ शायद
समझा भी पाता है।
कुछ कहे बिना भी ना जाने,
कितना कुछ कह जाता है।
प्यार फैलाता, दिल बहलाता
कभी किसी अक्श में,
किसी की याद दिलाता।
निगाहों को ये करामात है, खुदा ने बक्शी।
चाहत को चाहना, है तेरी मर्ज़ी।
अधूरी कहानी,
किस्से ज़ुबानी।
मिल जाए कहीं तो,
ले आते पानी।
निगाहों की है ये,
कला कुछ पुरानी।

-ऋषभ कुमार

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1 Comment

  1. “अधूरी कहानी,
    किस्से ज़ुबानी।
    मिल जाए कहीं तो,
    ले आते पानी।
    निगाहों की है ये,
    कला कुछ पुरानी।”

    बहुत खूब 👌

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