दोस्ती के बिखरे पल


ये गीत उनके लिए जो भागती दौडती ज़िन्दगी में कहीं दूर निकल जाते हैं, याद तो होते है पर दिक्कत इस बात की होती है कि अक्सर बस यादों में ही रह जाते हैं

जरा करीब तो आओ
जरा…. करीब तो आओ
जरा बैठो, कुछ सुनाओ
कहाँ चल दिए, कहाँ है जाना
थोडा बैठो तो,
कुछ तो सुनाना
कुछ हाल दिल के कहो
कुछ राज तो होंगे ही
कई दिनों से मिले नहीं
कुछ बात तो होगी ही
हम काबिल नहीं है क्या
क्या की है कोई खता
क्यूँ दूर हो रहे हैं हम
क्यों बढ़ रहा फासला
याद है! कभी एक वक्त था
ना कोई वजह, ना था कोई मतलब
फिर भी किसी टपरी पे, घंटों बैठते थे हम सब
ना पता था कि…. कहाँ है जाना
फिर भी निकल पड़ते थे, हर कदम पर था नया ठिकाना
कई रोज हम मिलें, कई किस्से भी बने
हर बार एक दूसरे की, हँसी हम लिया करे
स्कूल, कालेज, बचपन, सारी पुरानी बाते हों
फिर भी हर दिन को, हम फिर जिया करें
अच्छा, वो याद है?
जब हमारी लडाईयाँ हो जाती थी
दो टोली में बँट जाते तो थे
पर दिल से कभी बुरा ना कहते
एक रूठता, तो दूसरा मनाने को
एक जाता दूर, तो दूजा पास लाने को
ना जाने क्या हुआ, अब बडे जो हो गये
दिन बीतते जा रहें, हम कहीं खो रहे
जीने की होड़ है, कुछ पाना जरूर है
जरूरत तो है, पर ये दूरियाँ कुछ और है
अब क्या कहें,
अब क्या कहें शायद ये ही भाग दौड़ है
हम याद तो हैं, पर चाहत अब कुछ और है।
-ऋषभ कुमार

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आशा है आपको कविता अच्छी लगी होगी। अपने विचार, कुछ दोस्ती के किस्से आप भी शेयर करें। देखते हैं, किसने क्या सीखा और ये कविता आपको कितना छू सकी।
धन्यवाद!

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16 thoughts on “दोस्ती के बिखरे पल

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