कुछ रास्ते ऐसे
कहीं दूर के लगते थे,
कुछ किरणों में सिमटकर
बस यूँहीं हासिल हुएं।
कुछ मंजिलें वैसे
कहीं ख्वाब से लगते थे,
कुछ कंकडों में मिलकर
नजदीक मालूम हुएं।
कुछ तारे ऐसे
टिमटिमाते थे हमेशा,
कहीं दूर कुछ बातें, किया करते तो थे।
कुछ रातें सुबह तक, ढल जाया करती थी,
फिर बाते कभी भी, ना चुप होती बेवजह।
जज़्बात, हालात, कुछ और हो सकते,
कुछ याद, मुलाकात हो सकती थी जुदा।
कुछ नाम जहन में, बस जाते हैं यूँ,
राही हम घुमक्कड़ हो जाते फिर फना।
कुछ स्याह वहीं पर
तब लिखा तो करती थी।
एक तस्वीर कहीं पर
उकेर आती ही थी।
कहीं दूर कुछ आँखें, भर आती थी तब,
कि खुशी हैं किसी की चाहे हो जिस वजह

-ऋषभ कुमार

2020।©rishabhmyjoopress
-rishabh kumar

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