ना द्वेष, ना कोई डर, बेबाक, बेनकाब होता है।
चंचलता इरादों में लिए, शरारत की दुकान होता है।
हर एक नज़र पर साथी, हाँ बिल्कुल नादान सा।
हठीला, मस्ती का बुलबुला, हर सुख सम-उत्कर्ष सा।
दुनियादारी से दूर, आँखों में अलग सी चमक लिए।
आज को जिये गलियों में, आशाओं की पतंग लिए।
बचपन सचमुच, एक खुली किताब होता है।
अपनो की हँसी में, साथ हँसने का गुमान होता है।
बचपन, सच में हर किसी का ख्वाब होता है।

-rishabh kumar
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