क्या हुआ, कोशिश तो ज़रूरी है।


क्या हुआ,

कहाँ भटक गए?

चल रहे थे,

कहाँ खो गए?

वो नीला समुद्र,

वो विस्तृत अम्बर,

कहाँ गए?

सम्भावनाएं तो थी असीम,

कैसे आया ये बवंडर!

अनिश्चितताएँ तो थी लाजमी,

क्यों ना बनाए कल्पित तरूवर!

क्यों,

क्या पता न था?

कि एक दिन तो आएगा ऐसा,

धूप को भी राह मिलेगी।

चाह तुम्हारी अकेली तो नहीं,

इस चाह में थोडी ललकार लगेगी।

डरना है,

मरना भी है।

जिन्दा हो जब तक,

लडना भी है।

आसमान हमेशा,

नीला तो नहीं।

हर वन, उपवन,

अन्धेरा तो नहीं।

दिशा विहीन हो?

दशा ना देखो।

तुम हो कुलीन,

कर जरा तो सेंको।

कुछ भित्तियाँ,

अब पड जाए तो क्या।

कुछ चिह्न अब ज़रूरी हो गए

भटके का सम्भलना,

डरकर भी बढ़ते रहना,

हो चाहे कुछ भी,

पर कुछ तो कर गुजरना, अब

ज़रूरी हो गए,

ज़रूरी हो गए,

ज़रूरी हो गए।

-ऋषभ कुमा



Featured image by Ryan Holloway
Thank you all for your support.

🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱

You can also join myjoopress through Facebook Twitter Instagram and also on YouTube now.

2 Comments

  1. Wow, beautiful poem Rishabh 😊😊, so apt, deep and motivating, yup We should never give up, may be the moment we think, everything is lost and over, that moment, we we given it one more try, we might have succeeded.
    Keep writing!!!😃😃

    Liked by 2 people

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.