रास्ते मंजिल और जाने क्या
छोड़ आए हैं हम न जाने कहाँ
है वास्ता खुदी से ना किसी से यारी
चल रहे हैं हम हो दुखी संसारी
है पता कि गम है बाँटते नहीं हैं
खुद में हो परेशान वजह जाँचते नहीं हैं
क्षण भर की छाँव को समझते अपनी चादर
गागर भर की चाह भी लगती है सागर
भान रखते मान का चाहे होती परवाह
तारों सा जीवन अपनों से माँगते नहीं हैं
दिल से हैं हम नादान शायद मानते नहीं हैं
-ऋषभ कुमार

आराम तो नहीं, ‌कमाई बहुत होती है
हर गरीब के घर ‌शायद रजाई नहीं होती है
तन ढकने को चादर, सर पर छत भी ‍‌‍ख्वाब होता है
तमीज तो नहीं शब्दों की, पर दिल का मिलनसार होता है
कमाई पैसों से कम, इंसानियत की सच्ची तस्वीर सा
जब दे दे ज़ुबान, निभाए, भले हो फ़कीर सा
कईयों में शायद, किसी एक का नाम होता है
पर गरीब के घर सचमुच, कोई दूसरा ही जहान होता है
-ऋषभ कुमार

-rishabh kumar
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